Chandrapur 7 नवंबर : राज्य के तमाम पिछड़े वर्ग के छात्रों का विदेश में शिक्षा हासिल करने का सपना अब कठिन हो गया है, महाराष्ट्र की शिंदे सरकार ने इस शैक्षिक सत्र से पिछड़े वर्ग के छात्रों के लिए कड़े मापदंड घोषित किये है, जिससे राज्य के पिछड़े वर्ग के कई होनहार छात्रों को मायूसी झेलनी पड़ रही है.
कांग्रेस के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य प्रवीण पडवेकर ने इस संदर्भ में राज्य सरकार की कड़ी निंदा करते हुए इसे पिछड़े वर्ग को संविधान द्वारा प्राप्त संवैधानिक अधिकारों का हनन बताया है.
यहां एक पत्रपरिषद में पडवेकर ने बताया कि, विदेश में शिक्षा ग्रहण करने के लिए छात्रों को जीआरई तथा टॉफेल जैसी परीक्षाओं से गुजरना होता है. विदेशों के कॉलेजों में शिक्षा हेतु योग्यताप्राप्त छात्रों को राज्य सरकार की ओर से छात्रवृत्ति दी जाती है. इस छात्रवृत्ति के लिए पहले कोई आर्थिक मापदंड नहीं हुआ करता था, लेकिन राज्य सरकार ने 19 अक्टूबर की मंत्रिमंडल बैठक में निर्णय लेते हुए ऐसे छात्रों के लिए कड़े मापदंड घोषित कर दिए है.
उन्होंने बताया कि, सरकार ने इस छात्रवृत्ति के लिए अब सालाना 8 लाख तक की आय का मापदंड निर्धारित किया है. सरकार ने दूसरी शर्त रखते हुए विदेशों में जिन विश्विद्यालयों का क्यूएस रैंकिंग 200 है, उसी विश्विद्यालयों के कॉलेजों में प्रवेश की अनुमति घोषित की है. पहिले क्यूएस 100 रैंकिंग के विश्वविद्यालयों में पिछड़े वर्ग के छात्रों को कोई छात्रवृत्ति नहीं दी जाएगी. इसके अलावा भी सरकार ने कई और कड़े मापदंड लगा दिए है, जिसके कारण पिछड़े वर्ग के होनहार छात्रों का विदेश में शिक्षा का सपना अब दूभर होता जा रहा है.
उन्होंने आरोप लगाया कि, यह कड़े मापदंड सिर्फ महाराष्ट्र में ही लागू किये गए है, अन्य राज्यों में यह मापदंड नहीं है. उन्होंने कहा कि, राज्य सरकार जानबूझकर कड़े मापदंड लगाकर अनुसूचित जाति जनजाति के होनहार छात्रों के प्रगति के पंख छांटने का काम कर रही है. जो निंदनीय है. उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि,सरकार को यह मापदंड तुरन्त हटाने होंगे, अन्यथा इसके खिलाफ राज्य में आंदोलनों का सिलसिला शुरू हो सकता है.



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